Monday, 7 May 2012

भक्ति बिना पूरा जीवन व्यर्थ

लेख सार: प्रभु भक्ति के साथ जीवन यापन एंव  सैर सपाटा,  मौज मस्ती, एशो आराम और आने वाली पीढियों के लिए धन-संपति संग्रह में लगे जीवन के बीच तुलना की गई है। मानव जीवन का श्रेप्ठत्तम उपयोग पर लेख प्रकाश डालता है।
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एक कहानी / लोककथा प्रायः सबने सुन रखी होगी - एक ज्ञानी नाव में बैठकर नदी पार करते वक्त नाविक से अपना ज्ञान बखान कर रहा था । ज्ञानी नाविक से कह रहा था कि तुमनें पढा नही, अनपढ हो इसलिए तुम्हारा चौथाई जीवन बेकार हो गया। तुम्हें अमुक बात का ज्ञान नही इसलिए आधा जीवन बेकार हो गया, तुम्हें अमुक बात का भी भान नही इसलिए पौना जीवन बेकार हो गया । इतने मे भयंकर वर्षा होने लगी, वर्षा का जल नाव में भर गया और नदी में भी भयंकर उफान उठा। अब तक नाविक चुप बैठा था और सुन रहा था। अब नाविक के बोलने की बारी थी, उसने ज्ञानी से पुछा कि आपको तैरने का ज्ञान है क्या ? ज्ञानी ने कहा - नही, तो नाविक बोला - अब तो आपका पूरा जीवन ही बेकार हो गया। यह कह कर नाविक डुबती नाव से तैर कर अपनी जान बचाने के लिए कूद पडा । ज्ञानी को तैरना नही आता था इसलिए नाव के साथ ही डूब गया।

आध्यात्मिक तौर पर इस कथा को ऐसे समझना चाहिए । एक आधुनिक दौर का मौज मस्ती करने वाला मौजी नामक व्यक्ति एक सरलहृदय प्रभु भक्ति में रमने वाले भक्त से पुछता है कि क्या तुमने विदेश में सैर सपाटा किया । भक्त कहता है - नहीं, तो मैजी कहता है कि चौथाई जीवन व्यर्थ कर दिया । मौजी दुसरा प्रश्न पुछता है भक्त से कि क्या तुमने जीवन में मौज-मस्ती, ऐशो-आराम किया । भक्त कहता है - नहीं, तो मौजी कहता है कि तुमने अपना आधा जीवन ही व्यर्थ कर दिया । मौजी तीसरा प्रश्न पुछता है भक्त से कि क्या तुमने अपनी आने वाली पीढियों के लिए धन-संपति की व्यवस्था की। भक्त कहता है - नही, तो मौजी कहता है कि पौना जीवन व्यर्थ कर लिया ।

मौजी भक्त के लिए अफसोस करता है कि भक्ति में रम के क्या जीवन जिया, न सैर-सपाटा किया, न ऐशो-आराम किया और न ही आने वाली पीढी के लिए धन-संपति की व्यवस्था की । क्योंकि मौजी ने यह सब कुछ भरपूर मात्रा में किया था, इसलिए उसे अपने आप पर गर्व अनुभव होने लगता है।

इतने में मौजी के दरवाजे मृत्यु ने दस्तक दी। वह भयंकर रूप से बिमार हुआ और मृत्यु शय्या पर आ गया। भक्त मौजी के पास खडा था पर उसे कुछ पुछने की जरूरत ही नही पडी। मौजी की अंतरआत्मा ने ही मौजी से पुछ लिया कि क्या तुमने प्रभु भक्ति करके भवसागर पार करने का उपाय किया। मौजी ने काँपते हुये स्वर से कहा - '' नही किया '' । अंतरआत्मा ने धिक्कारते हुये कहा कि तुमने अपना पूरा मानव जीवन ही व्यर्थ कर लिया । जैसे ज्ञानी का नदी पार नहीं कर पाने के कारण अंत भयंकर हुआ, वैसे ही मौजी का भवसागर पार नहीं कर पाने के कारण अंत भयंकर हुआ। दोनों ही डूब गए, एक नदी में, दूसरा भवसागर में ।

अधिकत्तर मनुष्यों की विडंबना भी यही है कि मानव जीवन जीने की कला तो बहुत अच्छी तरह से सीख ली और उसे प्रभावी अंजाम देने में लगे हुये हैं । पर मानव जीवन के बाद उनका क्या हश्र होगा यह पहलु उनसे अछुता रह गया क्योंकि उसके लिए तैयारी करना शायद वे भुल गये ।


वर्तमान जीवन जीने की कला तो जानवर भी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं।पर मृत्यु उपरान्त की व्यवस्था जैसे आवागमन से मुक्ति, श्रीकमलचरणों में सदैव के लिए आश्रय और परमानंद की प्राप्ति तो सिर्फ और सिर्फ मानव जीवन में किये प्रयासो से ही संभव हो सकता है। यह प्रयास भक्ति का है, यह प्रयास प्रभु से जुडने का है, यह प्रयास प्रभु के बनने का है, यह प्रयास प्रभु को अपना बनाने का है।

वर्तमान जीवन में ऐशो-आराम, सैर-सपाटा, अगली पीढी हेतु संग्रह के प्रयास बहुत तुच्छ और गौण हैं। श्रेष्ठत्तम प्रयास निश्चल भक्ति द्वारा प्रभु प्रिय बनकर मृत्यु उपरान्त सदैव के लिए निश्चिंत होने का है।


यह स्वर्णिम अवसर प्रभु ने हमें मानव जीवन देकर दिया है , इसे गँवाना नही चाहिए। अगर गँवा दिया तो कितनी योनियों के बाद, इन योनियों के कर्मफल के कारण कितनी यातनाओ को भोगने के बाद, यह मानवजीवनरूपी अवसर दोबारा कब मिलेगा - यह सोचकर अविलम्ब इस वर्तमान मानवजीवनरूपी अवसर का प्रभु भक्ति में डुबकर श्रेष्ठत्तम उपयोग करना चाहिए ।
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लेखक परिचय:   परम सांत्वना केवल प्रभु के प्रति भक्ति से ही आती है | संदीप आर करवा पेननाम चंद्रशेखर के तहत प्रभु के प्रति समर्पण पर लेख लिखते हैं |  लेखक की वेबसाइट http://www.devotionalthoughts.in में दर्ज विचार आपको सर्वशक्तिमान ईश्वर के करीब ले जाएगा |

Friday, 13 April 2012

अनुकूलता और प्रतिकुलता में प्रभु-दर्शन

लेख सार  : सफलता और सुख के समय प्रभु की कृपा एवं विफलता और दुःख के समय में प्रभु की दया को याद रखने पर केन्द्रित लेख है    | वास्तव में, हम शायद ही कभी हमारी सफलता और सुख में प्रभु की कृपा याद रखते हैं | और वास्तव में, हम शायद ही कभी हमारी विफलता और   दुःख के   लिए प्रभु को दोष देने से चुकते हैं   |
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हमारे जीवन में जो कुछ भी अनुकूल घटना घट रही है , जो अनुकूलता है उसे प्रभु की कृपा प्रसादी माननी चाहिए । ऐसे ही हमारे जीवन में जो प्रतिकुल घटना घट रही है , जो प्रतिकुलता है उसे स्वंम के कर्मफल ( पूर्व संचित कर्मो का कर्मफल ) जिसको मेरे प्रभु ने दया करके बहुत बहुत कम करके हमें भोगने के लिए दिया है - ऐसा मानना चाहिए। हमारा दृष्टिकोण ऐसा होना चाहिए कि दोनों ही अवस्था में प्रभु की कृपा के दर्शन हो , प्रभु के कृपा का सदैव भान रहे। क्योंकि दोनों अवस्थाओ में प्रभु कृपा को देखने वाला ही प्रभु का प्रिय होता है ।


इस अनुपम सूत्र का आभास हमारे जीवनदृष्टि में शुद्धता आने पर ही संभव है। क्या है यह अनुपम सूत्र । पहला सूत्र - अनुकूलता में प्रभु कृपा का सदैव दर्शन करना चाहिए । दुसरा सूत्र - प्रतिकुलता में प्रभु की दया ( विपरित कर्मफल को प्रभु ने कम करने की दया की , इस भाव ) का सदैव दर्शन करना चाहिए।

पर हम मुर्ख जीव अनुकूलता को अपने संचित पूण्यकर्मो का स्वअर्जित फल समझ कर भोगते हैं और प्रतिकुलता प्रभु द्वारा भेजी गई ( देव बाधा रूप में ) मानते हुए प्रभु के उपर उसका दोष मढने से भी नही चुकते। कितना मुर्ख जीव है कि प्रतिकुलता में प्रभु दया के दर्शन नही करके उलटे प्रभु को दोष देने का भाव को अपने मन और बुद्धि में जाग्रत कर बैठता है। प्रभु के प्रति दोष का भाव हमारे मन में कभी पनपना भी नही चाहिए क्योंकि ऐसा कभी हो ही नही सकता कि मेरे प्रभु से कोई दोषयुक्त गलती होवे , ऐसी कल्पना मात्र भी करना बहुत बडा पाप है । पर हम जीवन मे अकसर ऐसा करते हैं।

उद्धाहरण स्वरूप एक घर का जवान बेटा , बुढे माता-पिता का एकमात्र सहारा , बहिनों का एकमात्र भाई जब कोई दुर्घटना मे चला जाता है तो परिवार के लोग यह कहते मिलेंगें कि प्रभु ने अन्याय कर दिया । यह सोच ही कितनी अपवित्र है, जुबान पर ऐसा शब्द आना कितना बडा पातक है। क्योंकि क्या हमें उस मृतक के पूर्वजन्मों के लेखे-जोखे का , संचित कर्मफल का पता भी है की उसके क्या क्या पूर्व कर्म रहे हैं।

प्रतिकुलता के वक्त हमारी पवित्र सोच यह होनी चाहिए कि मेरे प्रभु ने मेरे संचित बुरे कर्मो का फल कई गुण घटाकर मुझे भोगने हेतु दिया है। अगर मेरे संचित बुरे कर्मो का फल मेरे प्रभु नही घटाते तो मैं भोगने में असर्मथ होता ( यानी जितने पापकर्म मेरे द्वारा पूर्व जन्मों में हुये हैं उसका भोग भोगना भी मेरे लिए संभव नही था, इसलिए प्रभु ने कृपा करके उसे कई गुणा कम करके मेरे भोगने लायक बनाया है )। भोगने की शक्ति भी प्रभु ही प्रदान करते हैं । उद्धाहरण स्वरूप जवान बेटा मरने पर पहले दिन घर मे कोहराम मचता है पर १२ वे दिन तक सभी घटना से तालमेल बैठा लेते हैं। कहते हैं '' बिता हुआ समय मरहम का काम करता है '' । यह समयरूपी मरहम ( प्रतिकुलता भोगने की शक्ति) भी प्रभु की ही देन है , प्रभु की ही अनुकम्पा है ।

ऐसे ही अनुकूलता के वक्त भी हमारी पवित्र सोच यही होनी चाहिए कि मेरे प्रभु ने मेरे संचित अच्छे कर्मो का फल कई गुणा बढाकर मुझे भोगने हेतु दिया है । इसमें भी प्रभु कृपा के दर्शन अनिर्वाय रूप से करने की आदत डालनी चाहिए अन्यथा यह अहंकार पनपते देर नही लगेगा कि यह मेरे पूर्व संचित शुभकर्मो के कारण मेरा स्वअर्जित भाग्य है।


मेरे प्रभु का एक करूणायुक्त सिद्धांत है - जीव के पुण्यकर्मो का फल कई गुणा बढा देना और जीव के पापकर्मो का फल कई गुणा कम कर देना । अगर ऐसा नही होता तो आज हम जिस भी अवस्था में हैं ऐसी अवस्था में नही होते ( यानी अगर परिस्थिति हमारे अनुकूल है तो हमारे संचित पुण्यकर्मो के बल पर इतनी अनुकूल नही हो सकती थी और अगर परिस्थिति हमारे प्रतिकुल है तो हमारे संचित पापकर्मो के बल पर इससे बहुत अधिक प्रतिकुल हो सकती थी )। दोनों ही अवस्था मे प्रभु कृपा के कारण ही आज हम जैसे भी हैं वैसे हैं। इसलिए जीवन में हर पल , हर स्थिति में प्रभु कृपा के दर्शन करने की आदत जीवन में बनानी चाहिए।




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लेखक परिचय:   परम सांत्वना केवल प्रभु के प्रति भक्ति से ही आती है | संदीप आर करवा पेननाम चंद्रशेखर के तहत प्रभु के प्रति समर्पण पर लेख लिखते हैं |  लेखक की वेबसाइट  http://www.devotionalthoughts.in में दर्ज विचार आपको सर्वशक्तिमान ईश्वर के करीब ले जाएगा |



Monday, 13 February 2012

जीवन की राह प्रभु की ओर

लेख सार : सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ओर ले जाने वाली राह के साथ माया के मार्ग की तुलना में केंद्रित लेख है  |
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बड़े शहरो को जोड़ने वाली हाईवे में दो सड़के होती है | एक आने की और एक जाने की | आमने सामने की दिशा से आने जाने वाले वाहन अपने मार्ग पर चलते हैं | बीच में हर १५ - २० किलोमीटर पर हाईवे की दोनों सड़को के बीच एक कट आता है जहाँ से आप अपने वाहन को मोड़कर दिशा बदल सकते हैं |

ऐसे ही मानव जीवन में भी दो दिशाये हैं | एक माया की दिशा और दूसरी प्रभु की दिशा | दोनों दिशाये एक दूसरे से विपरीत है ( जैसे हाईवे पर आने जाने वाली दिशाये एक दूसरे के विपरीत होती है, यानी एक दिशा से वाहन आते हैं और उससे उलटी दिशा में वाहन जाते हैं | )

माया की दिशा चकाचौंध वाली है, जगमगाती है जैसे बड़े शहर आने पर हाईवे रौशनी से जगमगा उठती है | माया की दिशा सभी के लिए बड़ी सुलभ और माया की राह सबके लिए बड़ी आसान और आरामदायक है | आकर्षित करने हेतु तीनों गुण - जगमगाहट, सुलभता और आरामदायक - हमें माया के मार्ग में फसाने हेतु मौजूद हैं | पर इस माया के मार्ग पर चलते रहने से मार्ग की समाप्ति पर हम जिस मुकाम पर पहुचाते हैं वह बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण, भयानक और कष्टदायक होता है |

प्रभु के मार्ग में आकर्षित करने हेतु कोई चकाचौंध नहीं है और मार्ग भी सुलभ नहीं, कठिन है | पर मार्ग की समाप्ति पर भगवत सानिध्य, भगवत प्रेम और परमानन्द ( आनंद की परम पराकाष्ठा ) है |


माया के मार्ग में सुख मिल सकता है पर इस मार्ग में आनंद है ही नहीं, पर प्रभु के मार्ग से पहुचने पर आनंद और परमानन्द के अतिरिक्त वहाँ कुछ भी नहीं |

हर मनुष्य के जीवनकाल में दो-तीन बार मार्ग बदलने का मौका जरुर आता है, ठीक वैसे ही जैसे हाईवे पर चल रहे वाहन को दिशा बदलने हेतु दोनों सड़को के बीच कट आता है | यह मार्ग बदलने के मौको को प्रस्तुत करने हेतु जीवन में कोई ऐसा वाक्या / ऐसी घटना घटती है जैसे कोई व्यक्तिगत हानी, शारीरिक कष्ट, व्यापारिक नुकसान इत्यादि इत्यादि जिससे की मायारूपी जीवन में लिप्त उस मनुष्य का मायारूपी जीवन से क्षणभर की लिए मोहभंग होता है और वह प्रभु कृपा से प्रभु की तरफ आकर्षित होता है | कभी अपनों से वियोग, कभी अपनों द्वारा अपमान इत्यादि कई परिस्थितियां प्रभु प्रेरणा से हमारे जीवन में उपस्थित होती हैं और हमारा माया से मोहभंग कराती हैं | पर यह मोहभंग क्षणभंगुर होता है |

पर प्रभु ने मनुष्य को बुद्धि दी है, इस कारण मनुष्य से अपेक्षा होती है कि ऐसे मौको को हाईवे के सड़क कट की तरह समझे और अपनी जीवनरूपी गाड़ी को घुमाकर " माया के मार्ग " से " प्रभु मार्ग " की तरफ मोड़ दे | जीवन में ऐसे मौको को कभी चुकना नहीं चहिये |

जैसे हाईवे पर चल रही एक गाड़ी जिसमे इंधन बहुत कम बचा हो और इंधन भरने का पम्प उलटी दिशा में नजर आ रहा है, ऐसे में अगर गाड़ीवाला हाईवे के सड़क कट पर गाड़ी मोड़ना भूल जाये तो अगला सड़क कट उसे नसीब नहीं होगा (क्योंकि वह १५ - २० किलोमीटर आगे है, तब तक गाड़ी का तेल खत्म होकर गाड़ी रुक जाएगी ) | ऐसे ही एक मानव जिसकी जीवनलीला कब खत्म हो जाये इसका उसे पता नहीं, अगर वह " प्रभु मार्ग " में मुड़ने का मौका चुक गया तो अगला मौका उसे जीवन में कब नसीब होगा यह पता नहीं और तब तक उसके जीवन की गाड़ी रुक जाएगी (यानी शरीर शांत हो जायेगा ) | राजा परीक्षित शाप मिलाने के प्रश्चात ७ दिवस के लिए निश्चिंत थे क्योंकि उनकी मृत्यु ७ दिन बाद निश्चित थी - हमारी मृत्यु भी निश्चित है, पर कब निश्चित है, इसका हमें भान नहीं इसलिए हम अगले पल के लिए भी निश्चिंत नहीं हैं |

इसलिए जैसे प्रथम उपलब्ध कट पर ही गाड़ी मोड़ लेना समझदारी है, वैसे ही पहले उपलब्ध मौके पर " माया मार्ग " त्यागकर " प्रभु मार्ग " की तरफ मुड़ना सबसे बड़ी समझदारी है | जीवन की दिशा बदलने की यह मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी समझदारी भी प्रभुकृपा के कारण ही मनानी चाहिये ( यानी मेरे ऊपर मेरे प्रभु ने कृपादृष्टी डाली और मार्ग बदलने का अवसर मेरे जीवन में उपस्थित हुआ ) | मेरे प्रभु की पहली कृपा मनानी चाहिये कि - प्रभुमार्ग पर चलने का अवसर मेरे जीवन में आया | मेरे प्रभु की दूसरी कृपा मनानी चाहिये कि - उस अवसर को मेरी बुद्धि ने प्रभु प्रेरणा से खोया / गवाया नहीं |


मायारूपी भवर में फसे मनुष्य को प्रभु से सदा सच्ची प्रार्थना करते रहना चाहिये कि यह दोनों प्रभुकृपा उसके जीवन में भी हो |

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लेखक परिचय:   परम सांत्वना केवल प्रभु के प्रति भक्ति से ही आती है | संदीप आर करवा पेननाम चंद्रशेखर के तहत प्रभु के प्रति समर्पण पर लेख लिखते हैं |  लेखक की वेबसाइट  http://www.devotionalthoughts.in में दर्ज विचार आपको सर्वशक्तिमान ईश्वर के करीब ले जाएगा |

प्रभु नामरूपी धन

लेख सार  : संसारी धन बनाम प्रभु नामरूपी धन के बीच लेख में तुलना की गई  है  | लेख संक्षेप में यह कहने की कोशिश करता है कि आजीविका आवश्यकता से परे, संसारी धन का थोड़ा मूल्य या उपयोग है  | लेकिन हम आने वाली पीढ़ियों के लिए संसारी धन जमा करते हुए प्रभु नामरूपी धन अर्जित करना भूल जाते हैं , इस प्रकार हम अपना मानव जीवन बर्बाद कर देते हैं  | हम संसारी धन की कमजोर कमाई करते हैं  और प्रभु नामरूपी धन के रूप में मणि कमाने का महान अवसर खो देते हैं |
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सबसे " उत्तम धन " की व्याख्या क्या है ? दो मूल सिद्धांत के कारण ही धन की उत्तमता की व्याख्या संभव है |


पहला सिद्धांत - वही उत्तम धन जो सब जगह चले ( जैसे यूरो प्राय: सभी यूरोपियन देशो में चलता है | इसलिए यूरोप के किसी एक देश की मुद्रा के बजाय यूरो उत्तम क्योंकि वह उस देश के अलावा अन्य यूरोपियन देशो में भी चलता है ) |

दूसरा सिद्धांत - वही उत्तम धन जिससे सब कुछ उपलब्ध हो सके |

संसारी धन की ताकत को इन दोनों सिद्धांतो की कसौटी पर तोला जाये तो वह बहुत कमजोर साबित होता है |

पहले सिद्धांत ( उत्तम धन वही जो सब जगह चले) पर तोले तो पायेंगे की अगर हमने संसारी धन की विश्वमुद्रा ( पुरे विश्व में चलने वाली एक मुद्रा ) भी बना दी तो भी वह अन्य ग्रहों में नहीं चलेगा | अन्य ग्रहों की बात छोड़ दे , वह तो पृथ्वी में भी हर जगह नहीं चलेगी | उद्धरण स्वरुप अगर हम सागर में डूब रहे है और हमारी जेब में खूब सारी विश्वमुद्रा भरी है और एक मगरमच्छ हमें निगलने हेतु सामने है तो क्या हम सागर के मध्य में मगरमच्छ को विश्वमुद्रा देकर यह कह सकते हैं की हमें निगलो मत और अपनी पीठ पर बैठाकर हमें सागर के किनारे छोड़ दो | हमारा संसारी धन पृथ्वीलोक में मगरमच्छ से हमारी रक्षा तक नहीं कर सकता | संसारी धन की ताकत नहीं की वह अगले जन्म में हमारे काम आ सके | क्या इस जन्म का संसारी धन हमारे अगले जन्म में हमें मानव देह और एक सुसंपन्न परिवार में जन्म दिला सकता है? कदापि नहीं |

दूसरा सिद्धांत ( उत्तम धन वही जिससे सब कुछ उपलब्ध हो सके) पर तोले तो पायेंगे की हमारे संसारी धन से चाहे वह रूपया हो , सोना हो , जमीन जायदाद हो या कोई भी अन्य सम्पति हो , उससे हम जीवन की एक श्वास - जीवन का एक पल तक नहीं खरीद सकते | जीवन की एक श्वास भी भूल जाइए, क्या हम संसारी धन से स्वास्थ की गारंटी खरीद सकते हैं की हमें एक भी रोग, बीमारी, शारीरिक प्रतिकूलता नहीं हो | क्या हम संसारी धन से "आनंद" और उससे भी आगे "परमानन्द" की अनुभूति मात्र भी कर सकते हैं | हम मात्र सांसारिक सुख के तुच्छ्य साधन खरीद सकते हैं | " परमानन्द " एक शिखर का नाम है जबकि सांसारिक सुख उस शिखर के सबसे निचले पायेदान का नाम है |

सांसारिक धन की चर्चा करके हमने उसकी गुणवत्ता को देखा | अब चर्चा करते हैं प्रभु नामरूपी उस श्रेष्ठत्तम परमधन की | सांसारिक धन के सन्दर्भ में चर्चा किये दोनों सिद्धांत इस परमधन में लबालब डुबे नजर आयेंगे |

पहले सिद्धांत ( उत्तम धन वही जो सब जगह चले) - यह परमधन पृथ्वी के हर कोने में, पृथ्वी के हर कण में, सभी ग्रहों, सभी लोक (इहलोक , परलोक ) में स्थाई रूप से चलता है | इस परमधन की कमाई इस जन्म, अगले जन्म, जन्मोजन्म तक काम आती है | {अर्जुन जी ने मेरे प्रभु से पुछा कि अगर किसी ने पुरे जीवन आपकी भक्ति नहीं की और जीवन के अंतिम चरण में ही आपका स्मरण किया और फिर उसकी निर्धारित मृत्यु ने उसे आ दबोचा तो क्या उसका यह शुभकर्म व्यर्थ चला जाता है | उत्तर में मेरे प्रभु ने स्वयं श्रीमदगीताजी में अपने श्रीवचन में कहा कि अर्जुन मेरा स्मरण, मेरी भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती ( चाहे जीवन के अंतिम अवस्था में भी की गई हो ) क्योंकि मैं (प्रभु) उसे संजोये रखता हूँ और अगले जन्म में उस जीव को वह प्रदान करता हूँ | }

दूसरा सिद्धांत ( उत्तम धन वही जिससे सब कुछ उपलब्ध हो सके) -ऐसा कुछ भी नहीं जो यह परमधन उपलब्ध नहीं करा सकता | यह डूबते हुये हमारी सागर में, मगरमच्छ के सामने भी रक्षा करता है | गजेन्द्र मोक्ष की श्रीकथा इसका जीवंत उद्धाहरण है | क्योंकि जिन परमपिता परमेश्वर का यह नामधन है, संसार की, भूमंडल की, भूमंडल के बाहर की भी हर चीज उन्ही परमपिता परमेश्वर के आधीन है | इसलिय परमपिता का नामरूपी महाधन हर युग में, हर चीज पर बेखटक चलता ही नहीं दौडता है | उद्धाहरण स्वरुप आप नामरत्न के पुण्यो से अपने पूर्व जन्मों के कठिन से कठिन पापकर्म भी धो सकते हैं | आप नामरत्न के बल पर अपनी भाग्यरेखा भी बदल सकते हैं |

जरा सोचे ऐसा क्या है जो प्रभु नामरूपी धन से अर्जित नहीं किया जा सकता और जरा सोचे की ऐसी कौन सी जगह है जहा पर यह प्रभु नामरूपी नहीं चलता | यह महाधन यमलोक, नर्क में भी चलता है क्योंकि इसी नामरूपी धन के बल पर ही वहाँ से हमारी मुक्ति संभव होती है |

अब अंत में इतना जरुर सोचे की हमारे धन कमाने की प्रवीणता और प्रधानता कही " सांसारिक धन " कमाने तक तो सीमित होकर नहीं रह गई है | अगर ऐसा है तो इससे बड़ा दुर्भाग्य मानव जन्म लेकर और कुछ नहीं | अगर ऐसा है तो हमारे धन कमाने की प्रवीणता और प्रधानता को तत्काल प्रभु नामरूपी परमधन कमाने की तरफ अविलम्ब मोड़ना चाहिये नहीं तो यह मानव जीवन बेकार चला जायेगा | ठीक वैसे ही जैसे इंजिनियर बनकर एक व्यक्ति बेलदारी करे या सर्जन बनकर एक व्यक्ति अस्पताल में वार्डबॉय का काम करे |

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लेखक परिचय:   परम सांत्वना केवल प्रभु के प्रति भक्ति से ही आती है | संदीप आर करवा पेननाम चंद्रशेखर के तहत प्रभु के प्रति समर्पण पर लेख लिखते हैं |  लेखक की वेबसाइट   http://www.devotionalthoughts.in में दर्ज विचार आपको सर्वशक्तिमान ईश्वर के करीब ले जाएगा |